मृत्यु का स्वरूप
जीवन का प्रवाह अनंत है | हम अगणित वर्षों से जीवित है आगे अगणित वर्षों तक जीवित रहेंगे भृमवश मनुष्य यह
समझ बैठा है की जिस दिन बच्चा माता के पेट में आता है या गर्भ से उतपन्न होता है उसी समय से जीवन आंरभ होता
है और जब ह्रदय की गति बद हो जाने पर शरीर निर्जीव हो जाता है तो मृत्यु हो जाती है
शरीर की मृत्यु के बाद हमारा कोई असितत्व नहीं रहता बेचारा भौतिक विज्ञान स्वय अभी बाल्यावस्था में है |
गति के सबध में अब तक करीब तीन सिद्धातों का प्रतिपादन हो चुका है बेशक उन्होंने बिजली चलाई दरअसल
में अब तक ठीक -ठीक यह नहीं जाना जा सका की वह किस प्रकार चलती है
एक वैज्ञानिक कहता है की शरीर ही जीव है जिनमें छोटे -छोटे अबोध बच्चों ने पूवर्जन्म के विषय में सबधियों को
इस प्रकार पहचाना है की उसमें पुनर्जन्म के विषय में किसी प्रकार के सदेंह की नहीं रहती बालक जन्म लेते ही
दूध पीने लगता है ,यही पूर्व स्मति न होती तो वह बिना सिखाए किस प्रकार यह सब सीख जाता बहुत से बालकों में
अत्यल्प अवस्था में ऐसे अद्भुत गुण देखे जाते है जो प्रकट करते है की यह ज्ञान इस जन्म का नहीं वरन पूवजन्म का है
जीवन और शरीर एक वस्तु नहीं है जैसे कपड़ों को हम यथा समय बदलते रहते है उसी प्रकार जीव को भी शरीर
बदलने पड़ते हैं तमाम जीवन भर एक कपड़ा पहना नहीं जा सकता उसी प्रकार अंत जीवन तक एक शरीर नहीं
ठहर सकता अतएव उसे बार -बार बदलने आवश्यता पड़ती है | स्वभावः तो कपडा पुराना जीण -शेण होने पर
ही अलग किया जाता है पर कभी -कभी जल जाने किसी चीज में उलझकर फट जाने चूहों के काट देने या अन्य
कारणों से वह थोड़े ही बिना में बदल देना पड़ता है शरीर साधरणत : वृद्धवस्था में जिण होने पर नष्ट होता है परतु
यदि बीच में ही कोई आकसिमक कारण उपसिथित हो जाऍ तो अल्पायु में भी शरीर त्यागना पड़ता है |
मृत्यु किसी भी प्रकार की होती है मृत्यु से कुछ समय पूर्व मनुष्य को बड़ी बेचनी पीड़ा और छटपटातट होती है
क्योकि सब नदियों में से प्राण खींचकर एक जगह एकत्रित होता है किंतु पुराने अभ्यास के कारण वह फिर उन
नाड़ियों में खिसक जाता है जिससे एक प्रकार का आघत लगता है यही पीड़ा का कारण है जिस कारण से मृत्यु
हो रही हो तो उससे भी कष्ट उतपन्न होता है मरने से पूर्व प्राणी कष्ट पता है चाहें वह जवान से उसे प्रकट कर सके
या न कर सके लेकिन जब प्राण निकलने का समय बिलकुल पास आ जाता है तो एक प्रकार की मूच्छा आ जाती है
उस अचेतनावस्था में प्राण शरीर से बाहर निकल जाते है जब मनुष्य मरने को होता है तो उसकी समस्त बाहा
शक्तिया एक होकर अंतमुखी हो जाती है तो और फिर स्थूलशरीर से बाहर निकलें पढ़ती है जीव का शरीर
बैंगनी रंग की छाया लिए शरीर से बाहर निकलता है भारतीय योगी इसका रंग शुभ कोस्ट्कों में सुषुप्त अवस्था
में पड़ी रहती है वे सब एक होकर एक साथ निकलते के कारण जागत एव सजीव की घटनाओं को फिल्म के जैसे
देखा जाता है इस समय मन की आश्चयजनक शक्ति का पता लगता है उनमें से आधी भी घटनाओ के मानसिक
चित्रों को देखने के लिए जीवित समय में बहुत समय की आवश्यता होती पर वह बिलुकल ही स्वल्प समय में पूरी
पूरी तरह मानव -पटल पर घूम जाती है वह सार रूप में सस्कार बनकर मुतात्मा के साथ हो लेता है यह घड़ी पीड़ा
की होती है एक साथ हजार बिच्छुओ के दश का कष्ट होता है कोई मनुष्य भूल से अपने पुत्र पर तलवार चला दे वह
अधिकटी अवस्था में पड़ा झटपट रहा हो जबकि इन्द्रियों की शक्ति अंतमुखी होने लगती है तब ही बद हो जाता है
मृत्यु से पूर्व शरीर अपना कष्ट सह चुकता है बीमारी से या किसी आद्यात से शरीर और जिव के बंधन टूटने आरभ
हो जाते है डाली पर से फल उस समय टूटता है उसी प्रकार मृत्यु समय होती है मुख ,आँख ,कान ,प्रमुख मांग है
लोगो का प्राण मल -मूत्र माँगो से निकलता देखा जाता है घोर परिश्म से थका हुआ आदमी जिस प्रकार मृततमा की
जीवन भर का सारा श्रम उतारते के लिए एक निदा की आवशयकता होती है इन नींद से जीव को बड़ी शांति
मिलती है और आगे का काम करने के लिए शाक्ति प्राप्त कर लेता है मरने ही नींद नहीं आ जाती वरन इससे कुछ
देर लगती है प्राय : एक महीना तक लग जाता है कारण यह है की प्रणात के बाद कुछ समय तक जीवन की
वासनाएँ प्रौढ़ रहती है और वे धीरे - धीरे ही निबल पड़ती है कड़ा करके आने पर हमारे शरीर का रक्त -ससार
बहुत तीर्व होता रहता है पलग मिल जाने पर भी उतने समय तक जागते रहते है जब तक फिर रक्त की गति
धीमी न पड़ जाए मृतक की बड़ा आस्चर्य लगता है की मेरा शरीर कितना हल्का हो गया है वह हवा में पक्षियों
की तरफ उड़ सकता है स्थूलशरीर छोड़ने के बाद वह अपने मृत शरीर के आस पास ही मड़राता रहता है
मृत शरीर के आस पास प्रियजनों को रोता -बिलखता देखकर वह उनसे कुछ कहना चाहता है या वापस पुराने
के बाद बड़ी अजीव में पड़ गया स्थूलशरीर में और प्रियजनों में मोह होने के कारण मै उसके सपर्क में आना
चाहता था पर लाचार था | मै सबको देखता था पर मुझे कोई देख सकता था मै सबकी वाणी सुनता था पर मै
जो बड़े जोर -जोर से कहता था मै सबकी वाणी सुनता था इन सब बातो से कुछ तो कष्ट कितना हल्का हो गया
हूँ और कितनी तेजी से चोरों ओर उड़ सकता हूँ जीवित अवस्था में मै मौत से डरा करता था , यहाँ मुझे डरने लायक
कुछ भी बात मालूम नहीं हुई शरीर में होने कारण पुराने की अपेक्षा हर दूषित से अच्छा था मै अपना असितत्व
वैसा ही अनुभव करता था जैसा की जीवित दशा में कई बार मैंने अपने हाथ -पावों को हिलाया -डुलाया और अपने
अंग -प्रत्यगों को देखा पर मुझे ऐसा नहीं लगा मनो मर गया हूँ तब मैंने समझा की मृत्यु में कुछ डरने की बात नहीं है
वह शरीर -परिवतन की एक मामलों सुख किया है तब तक जीव बार बार उसके आस पास मड़राता रहता है जला
देने पर वह उसी समय निराश होकर दूसरी और मन को लौट लेता है किंतु गाड़ देने पर वह उस प्रिय वस्तु का मोह
करता है और बहुत दिनों तक उसके इधर उधर फिरा करता है अधिक अज्ञान और माया -मोह के बंधन में अधिक
द्ढ़ता से बधे हुए मृतक प्राय: श्मशानों में बहुत दिन तक चक्कर काटते रहते है शरीर की ममता बार - बार उधर
खींचती है और वे अपने को सभालने में असमथ होने के कारण उसी के आस पास रुदन करते है कई ऐसे होते है
जो शरीर की अपेक्षा प्रियजनों से अधिक मोह करते है वे मरघटों की बजाय प्रिय व्यक्तियो के निकट रहने का
प्रयत्न करते है बूढ़े मनुष्यो की वासनाएँ स्वभावः ढीली पड़ जाती है इसलिए वे मृत्यु के बाद बहुत जल्दी हो जाते है
किंतु वे तरुण जिनकी वासनाएँ प्रबल होती है बहुत काल तक विलाप करते फिरते है उनका शरीर कुछ जीवित
कुछ स्थूल -सा रहता है ऐसी आत्माएँ प्रेत रूप से दिखाई देती है मृत्यु से मरे हुआ के लिए यह नहीं है की वह तुंरत
ही प्रकट हो जाए उन्हें उसके लिए बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है और विशोष प्रकार का तप करना पड़ता है जीव प्रेत
के रूप में विदमात रहने है उनकी मानसिक स्थिति नींद भी नहीं लेने देती वे बदला लेने की इच्छा से या इन्द्रिय
वासनाओं को तप्त करने के लिए किसी पीपल के पुराने पेड़ की गुफा खड़हर या जलाशय के आस पास पड़े रहते
है और जब अवसर देखते है अपना असितत्व प्रकट करने या बदला लेने की इच्छा से प्रकट हो जाते है इन्ही प्रेतों
की कई तांत्रिक शव -साधना करके या मरघट जागकर अपने वश में कर लेते है और उनसे गुलाम की तरह काम
लेते है इस प्रकार प्रेत इस तांत्रिकसे प्रसन्न नहीं रहते वरन मन -ही -मन बड़ा क्रोध करते है और यदि मौका मिले
जाए ,तो उन्हें मार भी डालते है बंधन सभी को बुरा लगता है प्रेत लोग छूटने में असमथ होने के कारण अपने
मालिक का हुक्म बजाते है शेर की तरह उन्हें इससे दुःख रहता है एक ही स्थान पर रहने है और बिना कारण
जल्दी जल्दी स्थान -परिवतन नहीं करते |
इसका कुछ निशिचत नियम नहीं है यह जीव की योग्यता के ऊपर निभर है बालकों और मेहनत करने वालों को
अधिक नींद चाहिए ,किंतु बूढ़े और मेहनत करने वालों को अधिक नींद चाहिए किंतु बूढ़े और आरामतलब लोगों
का काम थोड़ी देर सोने से ही चल जाता है इसमें से एक वर्ष तक उसकी तदा भग होती है और पुरानी गलतियों के
सुधार तथा आगामी योग्यता के सपादत का प्रयत्न करता है यह अवधि एक मोटा हिसाब है कई विशिस्ट व्यकित
छह महीने में आयु अधिक से अधिक बाहर वर्ष समझी जाती है इस प्रकार दो जन्मो के बीच का अंतर अधिक से
अधिक बाहर वर्ष हो सकता है |
Post a Comment