मनुष्य के जीवन में प्रकाश कब फैलता है ? - Sarthaks eConnect
मनुष्य जीवन का प्रकाश
हमारे मन -वचन -काया दुसरो के लिए खर्च करें , यही तप है ,जप है ,साधना है
दूसरों को सुख देनें तो उसके प्रतिफल स्वरूप में सुख ही मिलेगा | यदि हम निखालसे (Open mind) हैं ,
सरल है तो उसके ही अनुरूप ज्ञान हमारे अंदर हो जाता है ठीक वैसे ही यदि हम सुख देते है तो कुदरती रूप से
हमारे भीतर ऐसा ज्ञान हो जाता है
ज्ञानी तो उसके अपने मन -वचन- काया के लिए होते है और तब ही
जीवन मे किसी ऊपरी या परमात्मा का होना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक है
जिन्हे देखने मात्र से ही हमारे दिल को ठंडक मिले और जगत विसमत्त हो जाए ,
उन्हें परमात्मा माना जा सकता है
माँ के मूक आशीष यदि जाए तो दुनिया की कोई ऐसी चीज नहीं है जो हमें न मिले | दुनिया की तमाम सुख -
समद्धि हमें घर बैठे ही मिल जाए, बारह ढूढने की जरूरत ही न पड़े |
माँ को दुःखी पहुँचाकर क्या हम सुखी रह सकते है ? और फिर सुख दुःख तो हमारी अपनी ही प्रतिध्वनि है
"सुख देने से मिलता है और दुःख देने दुःख |"
यदि हम सुधरगे तो ही समाज सुधरेगा | यदि हम बचपन से अच्छे सस्कारों के बीज बोयेंगे , बडो का विनय करेंगे
तभी समाज बदलेगा | समाज की शिकायत करने के बजाय हमें ही सुधारना है | हमारे ही अंदर अच्छे सस्कार व
नैतिक गुण खिलेने तो समाज का वातावरण अपने आप सुधर जाएगा और इसका फायदा हमें ही होगा ,
हम सुखी रह सकेंगे |
यदि आप दुःख नहीं चाहते तो दूसरो को दुःख न दें , सुख ही दें ताकि फलस्वरूप सुखी रह सकेंगे |
सबसे बड़ा यदि कोई धर्म हैं तो वह हैं ' मानवधर्म जो हमें अच्छा नहीं लगता , वह दूसरों को न दें , जैसे कि
दुःख | "जीवनमात्र को सुख देना ही धर्म हैं और दुःख देना ही अधर्म है | "
जिस दिन से हम हमारे मन -वचन -काया और धन दूसरों के लिए खचॅ करेंगे , उसी दिन से हमें भी कुदरत माता
पिता मित्रे और समाज के जरिए मदद करेगी |
जो व्यक्ति समस्त जगत के कल्याण के लिए सोचता है उसका खुद का कल्याण तो अपने आप ही हो जाता है |
जो व्यक्ति दुसरो को सुख देने की भावना करता है , विचार करता है , कुदरत उसे सभी प्रकार के सुख घर
बैठे ही पहुँचा देती है
माता - पिता की सेवा , बूढ़े - बीमार की सेवा तो बिना पैसे भी की जा सकती है जिसके फलस्वरूप ससार के
तमाम सुख घर बैठे ही प्राप्त ही सकते है |
यदि ससार के भौतिक सुख भी दुःख रूप लगने लगे और उससे मुक्त होना चाहें तो एटीएम 'आत्मधर्म '
अपनाइये | मानवधर्म के बाद 'आत्मधर्म ' आता है
' लालच ' एक अद्श्य पिंजरा ही है लालच में फॅसे की पिंजरे में कैद हो गये !
Shii h
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